
बदलती दिनचर्या और आधुनिक जीवनशैली का दुष्प्रभाव अब बच्चों के स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कभी केवल वयस्कों की बीमारी मानी जाने वाली उच्च रक्तचाप (हाई बीपी) की समस्या अब स्कूली बच्चों में भी तेजी से बढ़ रही है। शिमला में किए गए एक अध्ययन ने इस संबंध में चिंताजनक तथ्य उजागर किए हैं।
इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (आईजीएमसी) के बाल रोग विभाग द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि जिले के प्रत्येक 10 में से एक स्कूली बच्चा उच्च रक्तचाप की पूर्व अवस्था (प्री-हाइपरटेंशन) से जूझ रहा है, जबकि कुछ बच्चों में स्थायी उच्च रक्तचाप भी पाया गया है।
डॉ. हार्दिक महाजन, डॉ. राकेश शर्मा और डॉ. विपन रोच द्वारा किए गए इस अध्ययन में छह से 16 वर्ष आयु वर्ग के 300 स्कूली बच्चों को शामिल किया गया। वर्ष 2026 में प्रकाशित इस शोध के दौरान बच्चों का रक्तचाप निर्धारित चिकित्सकीय मानकों के अनुरूप मापा गया। जिन बच्चों का रक्तचाप पहली जांच में बढ़ा हुआ पाया गया, उनकी चार सप्ताह बाद दोबारा जांच कर परिणामों की पुष्टि की गई
अध्ययन के अंतिम निष्कर्षों के अनुसार 87.67 प्रतिशत बच्चे सामान्य पाए गए, जबकि 10 प्रतिशत बच्चे प्री-हाइपरटेंशन और 2.33 प्रतिशत बच्चे स्थायी उच्च रक्तचाप से पीड़ित पाए गए।
बढ़ता वजन बना सबसे बड़ा जोखिम कारक
शोध में यह तथ्य भी सामने आया कि बच्चों में बढ़ता वजन उच्च रक्तचाप का सबसे बड़ा कारण बनकर उभर रहा है। अध्ययन में केवल पांच प्रतिशत बच्चे अधिक वजन वाले थे, लेकिन स्थायी उच्च रक्तचाप से पीड़ित बच्चों में आधे से अधिक इसी श्रेणी के थे।
मोबाइल और जंक फूड बढ़ा रहे खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल फोन, वीडियो गेम, इंटरनेट और टेलीविजन पर बढ़ता समय बच्चों को खेल मैदानों से दूर कर रहा है। वहीं जंक फूड और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों का बढ़ता चलन भी बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। इसके परिणामस्वरूप जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां अब कम उम्र में ही बच्चों को अपनी चपेट में ले रही हैं।
नियमित स्वास्थ्य जांच की सिफारिश
शोधकर्ताओं ने स्कूलों में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, रक्तचाप जांच, वजन की निगरानी तथा खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया है। उनका मानना है कि समय रहते पहचान और उपचार से भविष्य में हृदय रोगों सहित कई गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है।
