
शिमला। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों—भूस्खलन, सिकुड़ते ग्लेशियर, अनियमित वर्षा और अचानक आने वाली बाढ़—के बीच हिमाचल प्रदेश अब जलवायु शिक्षा के क्षेत्र में देश के लिए नई मिसाल बनने की ओर अग्रसर है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट ‘घाटी की गूंज’ में हिमाचल के लिए एक अभिनव ग्रीन एजुकेशन मॉडल की सिफारिश की है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह मॉडल विद्यार्थियों को केवल पर्यावरण संबंधी सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि उन्हें जलवायु संकट को समझने और उससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण भी देगा। प्रदेश के शिक्षा मंत्री Rohit Thakur ने कहा कि विभागीय अधिकारी रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं और इसकी सिफारिशों को प्रदेश में लागू करने की दिशा में कार्य किया जाएगा।
यूनेस्को का मानना है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के केंद्र में स्थित हिमाचल प्रदेश जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को सबसे पहले और सबसे अधिक महसूस कर रहा है। इसी कारण राज्य को ग्रीन एजुकेशन मॉडल विकसित करने के लिए आदर्श प्रयोगशाला के रूप में देखा गया है।
रिपोर्ट में ‘होल इंस्टीट्यूशन अप्रोच’ अपनाने की सिफारिश की गई है। इसके तहत स्कूल भवनों की संरचना, जल संरक्षण, ऊर्जा प्रबंधन, कचरा निस्तारण, जैव विविधता संरक्षण तथा सामुदायिक भागीदारी को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जाएगा। इससे विद्यार्थी पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ अपने विद्यालय परिसर में ही जलवायु परिवर्तन के समाधान सीख सकेंगे।
यूनेस्को और हिमाचल शिक्षा विभाग की संयुक्त पहल एचपी फ्यूचर के तहत पिछले एक वर्ष में प्रदेश के सभी 12 जिलों के लगभग 200 विद्यालयों का अध्ययन किया गया। इस पहल में 500 से अधिक शिक्षकों और 10 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों ने भागीदारी निभाई।
रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश की मौजूदा पर्यावरणीय पहलों की भी सराहना की गई है। राज्य में मिशन लाइफ के अंतर्गत 14 हजार से अधिक ईको क्लब सक्रिय हैं, जो विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।
