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शिमला/नई दिल्ली। छात्रों में बढ़ते मानसिक तनाव, अवसाद और आत्महत्या की घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से Supreme Court of India द्वारा जारी अंतरिम दिशा-निर्देशों के अनुपालन में हिमाचल प्रदेश सरकार भी सक्रिय हो गई है। राज्य के उच्च शिक्षा विभाग ने सभी सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों को अदालत के निर्देशों का अनिवार्य रूप से पालन सुनिश्चित करने के आदेश जारी किए हैं। साथ ही छात्र मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े राष्ट्रीय टास्क फोर्स के सर्वेक्षण में सहयोग देने और निर्धारित मानकों को लागू करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सरकारी एवं निजी स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों, प्रशिक्षण केंद्रों, आवासीय अकादमियों और छात्रावासों पर समान रूप से लागू होंगे। प्रत्येक संस्थान को मानसिक स्वास्थ्य नीति तैयार करनी होगी, प्रशिक्षित काउंसलर उपलब्ध कराने होंगे तथा विद्यार्थियों के लिए गोपनीय और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करनी होगी।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि रैगिंग, बुलिंग, यौन उत्पीड़न तथा जाति, धर्म, लिंग या किसी भी प्रकार के भेदभाव से संबंधित शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की जाए। यदि किसी संस्थान की लापरवाही के कारण छात्र आत्म-क्षति या आत्महत्या जैसी घटना सामने आती है तो संबंधित संस्थान और उसके प्रबंधन के विरुद्ध कानूनी एवं नियामकीय कार्रवाई की जा सकती है।
उच्च शिक्षा विभाग ने सभी शिक्षण संस्थानों को छात्र मानसिक स्वास्थ्य, आत्महत्या रोकथाम तथा राष्ट्रीय टास्क फोर्स के सर्वेक्षण में सक्रिय सहयोग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। विभाग ने कहा है कि सभी संस्थान समयबद्ध तरीके से आवश्यक व्यवस्थाएं लागू करें।
दिशा-निर्देशों के अनुसार अभिभावकों के लिए नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि वे बच्चों पर अनावश्यक शैक्षणिक दबाव न डालें और मानसिक तनाव के शुरुआती संकेतों की समय रहते पहचान कर सकें। विद्यार्थियों के लिए जीवन कौशल, भावनात्मक संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाएगा।
इसके अलावा सभी शिक्षण संस्थानों को प्रतिवर्ष मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट तैयार कर संबंधित नियामक संस्था को भेजनी होगी। रिपोर्ट में काउंसिलिंग सेवाओं, वेलनेस गतिविधियों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और जरूरतमंद विद्यार्थियों को दिए गए रेफरल का पूरा विवरण शामिल रहेगा। साथ ही खेल, कला और व्यक्तित्व विकास जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा परीक्षा के दबाव को कम करने के लिए परीक्षा प्रणाली की समय-समय पर समीक्षा करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
