शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विधवा महिला कर्मचारी की पारिवारिक परिस्थितियों और कठिन भौगोलिक स्थिति को नजरअंदाज कर उसे नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई चतुर्थ श्रेणी महिला कर्मचारी छोटे बच्चों की देखभाल और गृह क्षेत्र से लगभग 300 किलोमीटर दूर जाकर कार्यभार संभालने में असमर्थ है, तो विभाग इसे नियमितीकरण से इंकार करने का आधार नहीं बना सकता।
न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने नोरात्रु देवी द्वारा राज्य वन निगम के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आज भी कर्मचारी पांगी जैसे दुर्गम क्षेत्रों में सेवाएं देने से बचते हैं, जबकि याचिकाकर्ता वहीं रहकर काम करने के लिए तैयार थीं। ऐसे में उनकी परिस्थितियों को मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि नोरात्रु देवी को जुलाई 2011 से काल्पनिक (Notional) आधार पर नियमित माना जाए, क्योंकि उसी समय उनके साथ कार्यरत अन्य कर्मचारियों का नियमितीकरण हुआ था। हालांकि, वर्ष 2011 से 2015 के बीच नियमित पद पर कार्य नहीं करने के कारण उन्हें उस अवधि का वास्तविक वेतन नहीं मिलेगा, लेकिन वरिष्ठता तथा अन्य सेवा संबंधी लाभ सुरक्षित रहेंगे।
याचिका के अनुसार, नोरात्रु देवी के पति लेखराम, जो राज्य वन निगम में दैनिक वेतनभोगी चौकीदार थे, का वर्ष 1996 में निधन हो गया था। इसके बाद उन्हें जनवरी 1999 में अनुकंपा के आधार पर पांगी में दैनिक वेतनभोगी चौकीदार के रूप में नियुक्त किया गया। वर्ष 2011 में निगम ने नियमितीकरण का विकल्प दिया, लेकिन इसके लिए उन्हें नाहन या बिलासपुर स्थित रेजिन एंड टरपेंटाइन फैक्ट्री में अनस्किल्ड वर्कर के रूप में कार्यभार ग्रहण करने की शर्त रखी गई।
याचिकाकर्ता ने विभाग से अनुरोध किया कि वह अकेली महिला हैं और उनके छोटे बच्चों की जिम्मेदारी है, इसलिए उन्हें पांगी में ही नियमित किया जाए। विभाग द्वारा अनुरोध अस्वीकार किए जाने के कारण वह वर्ष 2011 में नियमितीकरण का लाभ नहीं ले सकीं। बाद में अगस्त 2015 में उन्हें पांगी इकाई में ही चपरासी के पद पर नियमित किया गया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2011 से नियमितीकरण के सभी परिणामी लाभ देने की मांग को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसे अदालत ने आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
