हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शामलात भूमि पर पारंपरिक अधिकार समाप्त l

शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि हिमाचल प्रदेश विलेज कॉमन लैंड (वेस्टिंग एंड यूटिलाइजेशन) अधिनियम के तहत राज्य सरकार में निहित हो चुकी शामलात भूमि के आवंटन को दीवानी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि भूमि के सरकार में निहित होते ही ग्रामीणों के पारंपरिक बरतनदारी अधिकार, जैसे पशु चराना, लकड़ी या पत्थर लेना तथा शव दफनाना, स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की अदालत ने हमीरपुर जिले के नादौन क्षेत्र के ग्राम कोहला (संघ बिहाग) से जुड़े मामले में निचली अदालतों के फैसलों को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
कोहला गांव की शामलात भूमि से जुड़ा मामला
मामला हमीरपुर जिले के नादौन क्षेत्र स्थित ग्राम कोहला की शामलात भूमि से संबंधित है। वादी पक्ष का दावा था कि उन्हें इस भूमि पर पारंपरिक बरतनदारी अधिकार प्राप्त थे तथा राज्य सरकार ने नियमों के विपरीत भूमि का आवंटन कर दिया। वहीं प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि यह भूमि वर्ष 1974 के अधिनियम के तहत सरकार में निहित हो चुकी थी और वर्ष 1975 में नियमानुसार एक भूमिहीन व्यक्ति को आवंटित की गई थी। साथ ही ग्रामीणों के सामुदायिक उपयोग के लिए पर्याप्त भूमि सुरक्षित रखी गई थी।
निचली अदालतों के फैसले बरकरार
सिविल जज (जूनियर डिवीजन) नादौन ने वर्ष 2006 में वादियों का दावा खारिज कर दिया था। इसके बाद वर्ष 2008 में जिला न्यायाधीश हमीरपुर ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने दोनों फैसलों को सही मानते हुए अपील को भी खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून के तहत राज्य सरकार में निहित होने के बाद शामलात भूमि पुराने दावों और पारंपरिक अधिकारों से मुक्त हो जाती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन तथ्यों या आपत्तियों को ट्रायल कोर्ट या प्रथम अपीलीय अदालत के समक्ष नहीं उठाया गया, उन्हें दूसरी अपील में पहली बार नहीं उठाया जा सकता।
